केजीएमयू में फैक्टर-8 के 460 व फैक्टर-9 के 180 मरीज पंजीकृत, केजीएमयू में सर्जरी कर बचाई आठ हीमोफीलिया मरीजों की जान
लखनऊ। गर्भावस्था के दौरान जांच से ही इस बात का पता चल सकता है कि शिशु को हीमोफीलिया तो नहीं। इसके लिए गर्भवती को गर्भावस्था के दौरान कुछ जांचें करानी होती है। अगर गर्भावस्था में समय से इस बात का पता चल जाए तो जच्चा-बच्चा दोनों के लिए आसानी हो सकती है। यह जानकारी क्वीनमेरी अस्पताल की स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. रेखा सचान ने विश्व हीमोफीलिया दिवस की पूर्व संध्या पर दी। उन्होंने बताया कि शिशु में हीमोफीलिया जैसे अनुवांशिक रोग न हो इसके लिए गर्भावस्था में जांच जरूरी है। अगर परिवार में किसी को भी हीमोफीलिया है तो गर्भावस्था में जांच जरूर कराएं।एसजीपीजीआई में संभव है गर्भस्थ शिशु की जांच
यदि परिवार में एक बच्चे को हीमोफीलिया है तो अगले बच्चे में इस रोग का पता लगाया जा सकता है। यदि मौसी, मामा या परिवार में किसी बच्चे को हीमोफीलिया है तो शादी के बाद बच्चा प्लान करने से पहले संजय गांधी पीजीआई के मेडिकल जेनेटिक्स विभाग से संपर्क करें। इसमें गर्भ में पल रहे बच्चे की तीसरे महीने में डीएनए की जांच की जाती है। यदि जांच में बच्चे को हीमोफीलिया की पुष्टि होती है तो महिला को गर्भपात की सलाह दी जाती है। इस जांच में 8500 रुपये का खर्च आता है।क्या है हीमोफीलिया
हीमोफीलिया अनुवांशिक बीमारी है। इस बीमारी के कारण रक्त में थक्का बनने की प्रक्रिया बंद हो जाती है। जिससे हल्की से चोट लगने पर भी मरीज के घाव से खून बहना शुरू हो जाता है। कभी-कभी मरीज को आंतरिक रक्तस्राव भी होता है, जो थक्का न बनने के कारण बंद नहीं होता और उसके शरीर में खून की कमी हो जाती है। खून में थक्का न बनना फैक्टर आठ की कमी के कारण होता है। ऐसे मरीजों को समय-समय पर फैक्टर आठ इंजेक्शन से देना पड़ता है। इस बीमारी से ग्रस्त बच्चों के हड्डी के जोड़ों में रक्तस्राव के कारण सूजन आ जाती है।
यह है इलाज
अधिकतर हीमोफीलिया पीड़ितों में एफ-8 और एफ-9 प्रोटीन की कमी होती है। इन फैक्टर की कमी इंजेक्शन देकर दूर की जाती है। चोट बाहरी हो या अंदरूनी ये इंजेक्शन 15 मिनट में असर दिखाते हैं। हालांकि इसमें एक बड़ी समस्या अपंगता की है। फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. संजय सिंह बताते हैं कि अंदरूनी रक्तस्राव की वजह से जोड़ों में अपंगता आ जाती है।
केजीएमयू में पंजीकृत हैं 640 मरीज
केजीएमयू के हीमेटोलॉजी विभाग के हेड प्रो. एके त्रिपाठी ने बताया कि केजीएमयू के क्लीनिकल हीमेटोलॉजी विभाग में प्रतिदिन 30 से 35 मरीज हीमोफीलिया के आते हैं। इस समय केजीएमयू में हीमोफीलिया के 640 मरीज पंजीकृत हैं। इनमें से 460 मरीज फैक्टर-8 व 180 मरीज फैक्टर-9 के हैं। प्रो. एके त्रिपाठी ने बताया कि केजीएमयू उत्तर भारत का इकलौता चिकित्सा संस्थान है जहां हीमोफीलिया के मरीजों के लिए कांप्रिहेंसिव केयर सेंटर है।
बेड पर उपलब्ध है फीजियोथेरेपी की सुविधा
प्रो. एके त्रिपाठी ने बताया कि हीमोफीलिया के मरीजों में रक्तस्राव के कारण इनकी हड्डियों के जोड़ जाम होने लगते हैं। इसलिए उन्हें फिजियोथेरेपी भी करायी जाती है। केजीएमयू के हीमोफीलिया केयर सेंटर में इालाज के साथ ही काउंसलिंग, फिजियोथेरेपी, पुनर्वास, सर्जरी की भी सुविधा उपलब्ध है।
बीते साल में 12 मरीजों की की गई सर्जरी
प्रो. एके त्रिपाठी ने बताया कि हीमोफीलिया के मरीजों के जोड़ों के अधिक जाम होने पर सर्जरी की भी जरूरत पड़ती है। 2017 में (एक साल में) हीमोफीलिया के 12 मरीजों की सर्जरी की गई है। इनमें कैंसर से लेकर ट्रामा इंजरी के मरीज शामिल हैं। यहीं नहीं बीते साल केजीएमयू में मरीज के कूल्हे कर प्रत्यारोपड़ भी किया गया है।
ये ध्यान रखें डॉक्टर
गर्भवती से परिवार में बीमरियों का इतिहास पूछें।
पति-पत्नी दोनों की हीमोफीलिया जांच जरूर कराएं।
16 सप्ताह का गर्भ होने पर ट्रिपल टेस्ट जरूर कराएं।






















